महाभारत 2.1.7
न चापि तव संकल्पं मोघमिच्छामि दानवकृष्णस्य क्रियतां किंचित्तथा प्रतिकृतं मयि
na cāpi tava saṃkalpaṃ moghamicchāmi dānavakṛṣṇasya kriyatāṃ kiṃcittathā pratikṛtaṃ mayi
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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