महाभारत 2.18.21
एवमुक्तास्ततः सर्वे भ्रातरो विपुलौजसःवार्ष्णेयः पाण्डवेयौ च प्रतस्थुर्मागधं प्रति
evamuktāstataḥ sarve bhrātaro vipulaujasaḥvārṣṇeyaḥ pāṇḍaveyau ca pratasthurmāgadhaṃ prati
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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