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महाभारत 2.30.18
त्वत्कृते पृथिवी सर्वा मद्वशे कृष्ण वर्ततेधनं च बहु वार्ष्णेय त्वत्प्रसादादुपार्जितम्
tvatkṛte pṛthivī sarvā madvaśe kṛṣṇa vartatedhanaṃ ca bahu vārṣṇeya tvatprasādādupārjitam
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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