महाभारत 2.30.4
दस्युभ्यो वञ्चकेभ्यो वा राजन्प्रति परस्परम्राजवल्लभतश्चैव नाश्रूयन्त मृषा गिरः
dasyubhyo vañcakebhyo vā rājanprati parasparamrājavallabhataścaiva nāśrūyanta mṛṣā giraḥ
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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