महाभारत 2.30.50
दीयतां दीयतामेषां भुज्यतां भुज्यतामितिएवंप्रकाराः संजल्पाः श्रूयन्ते स्मात्र नित्यशः
dīyatāṃ dīyatāmeṣāṃ bhujyatāṃ bhujyatāmitievaṃprakārāḥ saṃjalpāḥ śrūyante smātra nityaśaḥ
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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