महाभारत 2.34.18अथ वा कृपणैरेतामुपनीतां जनार्दनपूजामनर्हः कस्मात्त्वमभ्यनुज्ञातवानसिatha vā kṛpaṇairetāmupanītāṃ janārdanapūjāmanarhaḥ kasmāttvamabhyanujñātavānasiइस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।पुस्तक में खोलेंयह श्लोक साझा करें