महाभारत 2.35.14
न केवलं वयं कामाच्चेदिराज जनार्दनम्न संबन्धं पुरस्कृत्य कृतार्थं वा कथंचन
na kevalaṃ vayaṃ kāmāccedirāja janārdanamna saṃbandhaṃ puraskṛtya kṛtārthaṃ vā kathaṃcana
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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