महाभारत 2.36.4
मतिमन्तस्तु ये केचिदाचार्यं पितरं गुरुम्अर्च्यमर्चितमर्चार्हमनुजानन्तु ते नृपाः
matimantastu ye kecidācāryaṃ pitaraṃ gurumarcyamarcitamarcārhamanujānantu te nṛpāḥ
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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