महाभारत 2.37.2
भीष्मं मतिमतां श्रेष्ठं वृद्धं कुरुपितामहम्बृहस्पतिं बृहत्तेजाः पुरुहूत इवारिहा
bhīṣmaṃ matimatāṃ śreṣṭhaṃ vṛddhaṃ kurupitāmahambṛhaspatiṃ bṛhattejāḥ puruhūta ivārihā
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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