महाभारत 2.40.3ततः सभार्यं नृपतिं सामात्यं सपुरोहितम्चिन्तासंमूढहृदयं वागुवाचाशरीरिणीtataḥ sabhāryaṃ nṛpatiṃ sāmātyaṃ sapurohitamcintāsaṃmūḍhahṛdayaṃ vāguvācāśarīriṇīइस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।पुस्तक में खोलेंयह श्लोक साझा करें