महाभारत 2.40.6
संश्रुत्योदाहृतं वाक्यं भूतमन्तर्हितं ततःपुत्रस्नेहाभिसंतप्ता जननी वाक्यमब्रवीत्
saṃśrutyodāhṛtaṃ vākyaṃ bhūtamantarhitaṃ tataḥputrasnehābhisaṃtaptā jananī vākyamabravīt
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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