महाभारत 2.47.17
इन्द्रगोपकवर्णाभाञ्शुकवर्णान्मनोजवान्तथैवेन्द्रायुधनिभान्संध्याभ्रसदृशानपि
indragopakavarṇābhāñśukavarṇānmanojavāntathaivendrāyudhanibhānsaṃdhyābhrasadṛśānapi
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
पुस्तक में खोलें