महाभारत 2.47.27
कोटिशश्चैव बहुशः सुवर्णं पद्मसंमितम्बलिमादाय विविधं द्वारि तिष्ठन्ति वारिताः
koṭiśaścaiva bahuśaḥ suvarṇaṃ padmasaṃmitambalimādāya vividhaṃ dvāri tiṣṭhanti vāritāḥ
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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