महाभारत 2.49.18
प्रणता भूमिपाश्चापि पेतुर्हीनाः स्वतेजसाधृष्टद्युम्नः पाण्डवाश्च सात्यकिः केशवोऽष्टमः
praṇatā bhūmipāścāpi peturhīnāḥ svatejasādhṛṣṭadyumnaḥ pāṇḍavāśca sātyakiḥ keśavo'ṣṭamaḥ
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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