महाभारत 2.5.112
कच्चिदग्निभयाच्चैव सर्पव्यालभयात्तथारोगरक्षोभयाच्चैव राष्ट्रं स्वं परिरक्षसि
kaccidagnibhayāccaiva sarpavyālabhayāttathārogarakṣobhayāccaiva rāṣṭraṃ svaṃ parirakṣasi
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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