महाभारत 2.5.18
कच्चिन्निद्रावशं नैषि कच्चित्काले विबुध्यसेकच्चिच्चापररात्रेषु चिन्तयस्यर्थमर्थवित्
kaccinnidrāvaśaṃ naiṣi kaccitkāle vibudhyasekacciccāpararātreṣu cintayasyarthamarthavit
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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