महाभारत 2.5.47
कच्चिद्व्यसनिनं शत्रुं निशम्य भरतर्षभअभियासि जवेनैव समीक्ष्य त्रिविधं बलम्
kaccidvyasaninaṃ śatruṃ niśamya bharatarṣabhaabhiyāsi javenaiva samīkṣya trividhaṃ balam
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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