महाभारत 2.5.55
कच्चित्स्वपरराष्ट्रेषु बहवोऽधिकृतास्तवअर्थान्समनुतिष्ठन्ति रक्षन्ति च परस्परम्
kaccitsvapararāṣṭreṣu bahavo'dhikṛtāstavaarthānsamanutiṣṭhanti rakṣanti ca parasparam
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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