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महाभारत 2.5.85
कच्चित्सर्वेऽनुरक्तास्त्वां भूमिपालाः प्रधानतःकच्चित्प्राणांस्त्वदर्थेषु संत्यजन्ति त्वया हृताः
kaccitsarve'nuraktāstvāṃ bhūmipālāḥ pradhānataḥkaccitprāṇāṃstvadartheṣu saṃtyajanti tvayā hṛtāḥ
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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