Loading
महाभारत 2.59.2
विदुर उवाच · vidura uvāca
दुर्विभाव्यं भवति त्वादृशेन; न मन्द संबुध्यसि पाशबद्धःप्रपाते त्वं लम्बमानो न वेत्सि; व्याघ्रान्मृगः कोपयसेऽतिबाल्यात्
durvibhāvyaṃ bhavati tvādṛśena; na manda saṃbudhyasi pāśabaddhaḥprapāte tvaṃ lambamāno na vetsi; vyāghrānmṛgaḥ kopayase'tibālyāt
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
पुस्तक में खोलें