महाभारत 2.6.4
वयं तु सत्पथं तेषां यातुमिच्छामहे प्रभोन तु शक्यं तथा गन्तुं यथा तैर्नियतात्मभिः
vayaṃ tu satpathaṃ teṣāṃ yātumicchāmahe prabhona tu śakyaṃ tathā gantuṃ yathā tairniyatātmabhiḥ
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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