महाभारत 2.65.8
नैवोक्ता नैव चानुक्ता अहिताः परुषा गिरःप्रतिजल्पन्ति वै धीराः सदा उत्तमपूरुषाः
naivoktā naiva cānuktā ahitāḥ paruṣā giraḥpratijalpanti vai dhīrāḥ sadā uttamapūruṣāḥ
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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