महाभारत 2.67.2
उपस्तीर्णा सभा राजन्नक्षानुप्त्वा युधिष्ठिरएहि पाण्डव दीव्येति पिता त्वामाह भारत
upastīrṇā sabhā rājannakṣānuptvā yudhiṣṭhiraehi pāṇḍava dīvyeti pitā tvāmāha bhārata
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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