महाभारत 2.67.4
अक्षद्यूते समाह्वानं नियोगात्स्थविरस्य चजानन्नपि क्षयकरं नातिक्रमितुमुत्सहे
akṣadyūte samāhvānaṃ niyogātsthavirasya cajānannapi kṣayakaraṃ nātikramitumutsahe
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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