महाभारत 2.67.6
विविशुस्ते सभां तां तु पुनरेव महारथाःव्यथयन्ति स्म चेतांसि सुहृदां भरतर्षभाः
viviśuste sabhāṃ tāṃ tu punareva mahārathāḥvyathayanti sma cetāṃsi suhṛdāṃ bharatarṣabhāḥ
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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