महाभारत 2.68.39
अक्षान्यान्मन्यसे मूढ गान्धाराणां यशोहरनैतेऽक्षा निशिता बाणास्त्वयैते समरे वृताः
akṣānyānmanyase mūḍha gāndhārāṇāṃ yaśoharanaite'kṣā niśitā bāṇāstvayaite samare vṛtāḥ
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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