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महाभारत 2.68.45
निदेशाद्धर्मराजस्य द्रौपद्याः पदवीं चरन्निर्धार्तराष्ट्रां पृथिवीं कर्तास्मि नचिरादिव
nideśāddharmarājasya draupadyāḥ padavīṃ carannirdhārtarāṣṭrāṃ pṛthivīṃ kartāsmi nacirādiva
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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