महाभारत 2.70.17
यद्येतदहमज्ञास्यं वनवासो हि वो ध्रुवम्शतशृङ्गान्मृते पाण्डौ नागमिष्यं गजाह्वयम्
yadyetadahamajñāsyaṃ vanavāso hi vo dhruvamśataśṛṅgānmṛte pāṇḍau nāgamiṣyaṃ gajāhvayam
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
पुस्तक में खोलें