महाभारत 2.8.14
औशीनरः पुण्डरीकः शर्यातिः शरभः शुचिःअङ्गोऽरिष्टश्च वेनश्च दुःषन्तः संजयो जयः
auśīnaraḥ puṇḍarīkaḥ śaryātiḥ śarabhaḥ śuciḥaṅgo'riṣṭaśca venaśca duḥṣantaḥ saṃjayo jayaḥ
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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