महाभारत 3.151.8
सेवितामृषिभिर्दिव्यां यक्षैः किंपुरुषैस्तथाराक्षसैः किंनरैश्चैव गुप्तां वैश्रवणेन च
sevitāmṛṣibhirdivyāṃ yakṣaiḥ kiṃpuruṣaistathārākṣasaiḥ kiṃnaraiścaiva guptāṃ vaiśravaṇena ca
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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