महाभारत 3.171.7
एवं संपूजितस्तत्र सुखमस्म्युषितो नृपइन्द्रस्य भवने पुण्ये गन्धर्वशिशुभिः सह
evaṃ saṃpūjitastatra sukhamasmyuṣito nṛpaindrasya bhavane puṇye gandharvaśiśubhiḥ saha
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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