महाभारत 3.179.4विरूढशष्पा पृथिवी मत्तदंशसरीसृपाबभूव पयसा सिक्ता शान्तधूमरजोऽरुणाvirūḍhaśaṣpā pṛthivī mattadaṃśasarīsṛpābabhūva payasā siktā śāntadhūmarajo'ruṇāइस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।पुस्तक में खोलेंयह श्लोक साझा करें