महाभारत 3.179.5
न स्म प्रज्ञायते किंचिदम्भसा समवस्तृतेसमं वा विषमं वापि नद्यो वा स्थावराणि वा
na sma prajñāyate kiṃcidambhasā samavastṛtesamaṃ vā viṣamaṃ vāpi nadyo vā sthāvarāṇi vā
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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