महाभारत 3.18.5
नास्य विक्षिपतश्चापं संदधानस्य चासकृत्अन्तरं ददृशे कश्चिन्निघ्नतः शात्रवान्रणे
nāsya vikṣipataścāpaṃ saṃdadhānasya cāsakṛtantaraṃ dadṛśe kaścinnighnataḥ śātravānraṇe
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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