महाभारत 3.198.27
जनकस्येह विप्रर्षे विकर्मस्थो न विद्यतेस्वकर्मनिरता वर्णाश्चत्वारोऽपि द्विजोत्तम
janakasyeha viprarṣe vikarmastho na vidyatesvakarmaniratā varṇāścatvāro'pi dvijottama
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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