महाभारत 3.198.46
न लोके राजते मूर्खः केवलात्मप्रशंसयाअपि चेह मृजा हीनः कृतविद्यः प्रकाशते
na loke rājate mūrkhaḥ kevalātmapraśaṃsayāapi ceha mṛjā hīnaḥ kṛtavidyaḥ prakāśate
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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