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महाभारत 3.198.71
यो यथाप्रकृतिर्जन्तुः स्वां स्वां प्रकृतिमश्नुतेपापात्मा क्रोधकामादीन्दोषानाप्नोत्यनात्मवान्
yo yathāprakṛtirjantuḥ svāṃ svāṃ prakṛtimaśnutepāpātmā krodhakāmādīndoṣānāpnotyanātmavān
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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