महाभारत 3.210.7
बृहद्रथंतरं मूर्ध्नो वक्त्राच्च तरसाहरौशिवं नाभ्यां बलादिन्द्रं वाय्वग्नी प्राणतोऽसृजत्
bṛhadrathaṃtaraṃ mūrdhno vaktrācca tarasāharauśivaṃ nābhyāṃ balādindraṃ vāyvagnī prāṇato'sṛjat
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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