Loading
महाभारत 3.224.4
कृष्णे मा भूत्तवोत्कण्ठा मा व्यथा मा प्रजागरःभर्तृभिर्देवसंकाशैर्जितां प्राप्स्यसि मेदिनीम्
kṛṣṇe mā bhūttavotkaṇṭhā mā vyathā mā prajāgaraḥbhartṛbhirdevasaṃkāśairjitāṃ prāpsyasi medinīm
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
पुस्तक में खोलें