महाभारत 3.235.7
वचनाद्देवराजस्य ततोऽस्मीहागतो द्रुतम्अयं दुरात्मा बद्धश्च गमिष्यामि सुरालयम्
vacanāddevarājasya tato'smīhāgato drutamayaṃ durātmā baddhaśca gamiṣyāmi surālayam
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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