महाभारत 3.239.21
जुह्वत्यग्नौ हविः क्षीरं मन्त्रवत्सुसमाहिताःब्राह्मणा वेदवेदाङ्गपारगाः सुदृढव्रताः
juhvatyagnau haviḥ kṣīraṃ mantravatsusamāhitāḥbrāhmaṇā vedavedāṅgapāragāḥ sudṛḍhavratāḥ
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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