महाभारत 3.239.5
सत्कृतस्य हि ते शोको विपरीते कथं भवेत्मा कृतं शोभनं पार्थैः शोकमालम्ब्य नाशय
satkṛtasya hi te śoko viparīte kathaṃ bhavetmā kṛtaṃ śobhanaṃ pārthaiḥ śokamālambya nāśaya
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
पुस्तक में खोलें