महाभारत 3.243.15
तमब्रवीत्तदा कर्णः शृणु मे राजकुञ्जरपादौ न धावये तावद्यावन्न निहतोऽर्जुनः
tamabravīttadā karṇaḥ śṛṇu me rājakuñjarapādau na dhāvaye tāvadyāvanna nihato'rjunaḥ
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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