महाभारत 3.243.2
लाजैश्चन्दनचूर्णैश्चाप्यवकीर्य जनास्तदाऊचुर्दिष्ट्या नृपाविघ्नात्समाप्तोऽयं क्रतुस्तव
lājaiścandanacūrṇaiścāpyavakīrya janāstadāūcurdiṣṭyā nṛpāvighnātsamāpto'yaṃ kratustava
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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