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महाभारत 3.249.4
धातुर्विधातुः सवितुर्विभोर्वा; शक्रस्य वा त्वं सदनात्प्रपन्नान ह्येव नः पृच्छसि ये वयं स्म; न चापि जानीम तवेह नाथम्
dhāturvidhātuḥ saviturvibhorvā; śakrasya vā tvaṃ sadanātprapannāna hyeva naḥ pṛcchasi ye vayaṃ sma; na cāpi jānīma taveha nātham
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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