महाभारत 3.25.4
एवमुक्ते प्रत्युवाच धर्मराजं धनंजयःगुरुवन्मानवगुरुं मानयित्वा मनस्विनम्
evamukte pratyuvāca dharmarājaṃ dhanaṃjayaḥguruvanmānavaguruṃ mānayitvā manasvinam
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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