महाभारत 3.25.7
यः सर्वलोकद्वाराणि नित्यं संचरते वशीदेवलोकाद्ब्रह्मलोकं गन्धर्वाप्सरसामपि
yaḥ sarvalokadvārāṇi nityaṃ saṃcarate vaśīdevalokādbrahmalokaṃ gandharvāpsarasāmapi
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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