महाभारत 3.258.2
आश्रमाद्राक्षसेन्द्रेण रावणेन विहायसामायामास्थाय तरसा हत्वा गृध्रं जटायुषम्
āśramādrākṣasendreṇa rāvaṇena vihāyasāmāyāmāsthāya tarasā hatvā gṛdhraṃ jaṭāyuṣam
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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