महाभारत 3.27.4
ज्याघोषः पाण्डवेयानां ब्रह्मघोषश्च धीमताम्संसृष्टं ब्रह्मणा क्षत्रं भूय एव व्यरोचत
jyāghoṣaḥ pāṇḍaveyānāṃ brahmaghoṣaśca dhīmatāmsaṃsṛṣṭaṃ brahmaṇā kṣatraṃ bhūya eva vyarocata
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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