महाभारत 3.271.11
सोऽभिपत्य महावेगं रुक्मपुङ्खं महाशरम्प्राहिणोत्कुम्भकर्णाय लक्ष्मणः परवीरहा
so'bhipatya mahāvegaṃ rukmapuṅkhaṃ mahāśaramprāhiṇotkumbhakarṇāya lakṣmaṇaḥ paravīrahā
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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